कल की इंतजार में,
कितने आज, कल बन गए ।
फिर भी न मिला वो सुकून,
वो चेहरा जिसे ढूंढती है हर पल यह नजर ।
बेवजा दिल की आईने में,
इतनी धुंध और धूल कब जम गई ।
वो झिल्लड़ मन की दर्पण पर,
बचपन कि शाया में ही कहीं
खो गई थी चमक जिस कि ।
वो रूहानियत ओझल हुई तब से.....
खुद से मुलाक़ात की तलब
कर रहि है बैचेन ।
जिंदा रहने की ख्वाहिश ने
कब जिंदगी से दूर करदिया ।
पहचान बना ने की दौड़ में
परछाई तक ने अंजान करदिया ।
कोशिश है बस यही इस सफर में,
ढूंढ पाऊं वो खोई सादगी ।
मिल जाए वो खोया चेहरा,
जो नजर आती थी कब दिल की आईने में ।
कल की इंतजार में,
कितने आज, कल बन गए ।
फिर भी न मिला वो सुकून,
वो चेहरा जिसे ढूंढती है हर पल यह नजर ।
बेवजा दिल की आईने में,
इतनी धुंध और धूल कब जम गई ।
वो झिल्लड़ मन की दर्पण पर,
बचपन कि शाया में ही कहीं
खो गई थी चमक जिस कि ।
वो रूहानियत ओझल हुई तब से.....
रब की देन थी वो रूहानियत, वो सादगी
सफेद थी वो चादर,
दाग तो देन हे खुद की ।
यह मैली चादर ओढ़ के,
कैसे करू वापसी तेरे दर पे ।
कैसे करू बयान,
जो गुमशुदा हो खुद में ही कहीं ।
= = राम पटनायक = =
Leave a comment